

स्थान : चंपावत
ब्यूरो रिपोर्ट

उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला को गुरुवार को पूरे चंपावत जिले में श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में लोगों ने एक-दूसरे को हरेला पर्व की शुभकामनाएं दीं। पर्व के अवसर पर घरों और सार्वजनिक स्थानों पर पौधारोपण कार्यक्रम भी आयोजित किए गए, जिससे पूरे क्षेत्र में हरियाली और उत्सव का माहौल देखने को मिला।


हरेला को उत्तराखंड में सुख, समृद्धि और हरियाली का प्रतीक माना जाता है। सुबह माताओं और बहनों ने पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर नौ दिन पहले बोए गए हरेले को काटा। इसके बाद उन्होंने अपने भाइयों और बच्चों के सिर पर हरेला रखकर उनकी लंबी आयु, सुख-समृद्धि और निरोग जीवन की कामना की तथा आरती उतारी।


इस अवसर पर घरों में पारंपरिक कुमाऊँनी व्यंजन भी तैयार किए गए। भाइयों ने अपनी बहनों को उपहार भेंट कर इस लोकपर्व की खुशियां साझा कीं। पर्व के दौरान परिवारों में पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए आपसी प्रेम और स्नेह का विशेष वातावरण देखने को मिला।


मान्यता के अनुसार हरेला पर्व से लगभग नौ दिन पहले मातृशक्ति द्वारा विभिन्न प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। हरेला तैयार होने के बाद शुभ मुहूर्त में उसकी पूजा कर उसे काटा जाता है और परिवार के सदस्यों के सिर पर रखकर मंगलकामना की जाती है। यह परंपरा पीढ़ियों से उत्तराखंड की लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है।

लोहाघाट क्षेत्र सहित जिले के कई स्थानों पर हरेला पर्व के अवसर पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाया गया। स्थानीय लोगों ने फलदार और छायादार पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। लोकमान्यता है कि हरेला के दिन लगाया गया पौधा शुभ फल देता है और समय के साथ विशाल वृक्ष बनकर प्रकृति की सेवा करता है।


हरेला पर्व के अवसर पर चंपावत जिले के कई क्षेत्रों में मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया। इनमें बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों, महिलाओं और बच्चों ने भाग लिया। लोकगीतों, पारंपरिक रीति-रिवाजों और सामूहिक आयोजनों ने पर्व की रौनक को और बढ़ा दिया।



सदियों से मनाया जा रहा हरेला पर्व उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, कृषि परंपरा और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, हरियाली और सामाजिक एकता का संदेश देता है। इस वर्ष भी पूरे जिले में हरेला को लेकर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों में विशेष उत्साह देखने को मिला।

