ज्योलीकोट दूषित पानी मामले में हाईकोर्ट सख्त, डीएम-सीएमओ समेत चार अधिकारी तलब

ज्योलीकोट दूषित पानी मामले में हाईकोर्ट सख्त, डीएम-सीएमओ समेत चार अधिकारी तलब

स्थान : ज्योलीकोट
ब्यूरो रिपोर्ट

ज्योलीकोट और आसपास के गांवों में दूषित पेयजल के कारण जलजनित बीमारियां फैलने और लोगों की मौत के मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने नैनीताल के जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्साधिकारी समेत चार वरिष्ठ अधिकारियों को 8 सितंबर को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।

मामला नैनीताल से हल्द्वानी-दिल्ली मार्ग पर स्थित ज्योलीकोट और आसपास के गांजा, वीरभट्टी, छीणा, बेलुवाखान तथा सरियाताल समेत कई क्षेत्रों से जुड़ा है। यहां पिछले करीब तीन महीनों से डायरिया, पीलिया, टाइफाइड और अन्य जलजनित बीमारियों के मामले सामने आने की शिकायत की गई है।

इस मामले को लेकर बेलुवाखान निवासी अधिवक्ता रवि बिष्ट की ओर से जनहित याचिका दायर की गई। याचिका में आरोप लगाया गया कि दूषित पेयजल की समस्या के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीण बीमार हुए हैं और कुछ लोगों की मौत भी हुई है। याचिकाकर्ता ने प्रभावित लोगों को निशुल्क उपचार और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की मांग की है।

न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता की ओर से संबंधित विभागों की कथित निष्क्रियता का मुद्दा उठाते हुए कहा गया कि लगातार शिकायतों के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने नैनीताल के जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्साधिकारी, उत्तराखंड जल संस्थान के महाप्रबंधक और उत्तराखंड पेयजल निगम के कुमाऊं मंडल के मुख्य अभियंता को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है। अधिकारियों को बीमारी के प्रकोप से निपटने के लिए अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी भी अदालत के सामने रखनी होगी।

अदालत ने अधिकारियों को प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने और समस्या के स्थायी समाधान के लिए विस्तृत कार्ययोजना के साथ उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा है कि दूषित पानी की समस्या को समाप्त करने के लिए विभाग आगे क्या ठोस व्यवस्था करेगा।

खंडपीठ ने उत्तराखंड जल संस्थान के अधिशासी अभियंता को प्रभावित गांवों में तत्काल प्रभाव से स्वच्छ और संदूषण-मुक्त पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोगों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा मामला होने के कारण इसमें किसी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।

क्षेत्र में बीमारी के बढ़ते मामलों के कारण ग्रामीणों में भी चिंता बनी हुई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पेयजल की गुणवत्ता को लेकर लंबे समय से शिकायतें की जा रही थीं, लेकिन समस्या का समय रहते समाधान नहीं हो सका। हालिया रिपोर्टों में बड़ी संख्या में लोगों के बीमार होने की बात भी सामने आई है।

हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद अब जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और पेयजल से जुड़े विभागों की जवाबदेही बढ़ गई है। अदालत की अगली कार्यवाही में अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले रोडमैप और प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल आपूर्ति के लिए उठाए गए कदमों पर सभी की नजर रहेगी।