नाग पंचमी से पहले भट्टा गांव से निकली नाग देवता की डोली यात्रा

नाग पंचमी से पहले भट्टा गांव से निकली नाग देवता की डोली यात्रा

स्थान : मसूरी
ब्यूरो रिपोर्ट

नाग पंचमी से पहले मसूरी के भट्टा गांव से भगवान नाग देवता की डोली पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ क्यारकुली स्थित नाग देवता मंदिर के लिए रवाना हुई। बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु डोली यात्रा में शामिल हुए। ढोल-दमाऊ की थाप और नाग देवता के जयकारों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय नजर आया।

डोली यात्रा में महिलाएं सिर पर कलश लेकर चलती दिखाई दीं, जबकि बड़ी संख्या में पुरुष और युवा भी यात्रा का हिस्सा बने। भट्टा गांव में विधिवत पूजा-अर्चना के बाद डोली को मसूरी मार्ग होते हुए कार्ट मैकेंजी मार्ग से क्यारकुली स्थित नाग देवता मंदिर ले जाया गया।

यात्रा के दौरान ग्रामीणों में खासा उत्साह देखने को मिला। स्थानीय मान्यता के अनुसार भगवान नाग देवता क्यारकुली-भट्टा क्षेत्र के रक्षक और ग्राम देवता हैं। इसी आस्था के चलते हर वर्ष नाग पंचमी से पहले भट्टा गांव से नाग देवता की डोली यात्रा निकाली जाती है।

ग्रामीणों के मुताबिक यह डोली यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की करीब पांच सौ वर्ष पुरानी लोक आस्था और परंपरा का हिस्सा है। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा में बुद्धवार भी ग्रामीण बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और नई पीढ़ी भी इसमें अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार क्यारकुली स्थित नाग देवता मंदिर करीब 500 वर्ष पुराना है। मंदिर से जुड़ी लोककथा के मुताबिक पुराने समय में एक ग्रामीण की गाय रोज चरने के बाद घर लौटती थी, लेकिन उसके थनों में दूध नहीं रहता था। ग्रामीण ने जब इसका कारण जानने का प्रयास किया तो उसने गाय को एक पत्थर पर दूध चढ़ाते हुए देखा।

मान्यता है कि ग्रामीण ने उस स्थान पर नाग देवता को दूध ग्रहण करते देखा। इसके बाद इस स्थान को पवित्र मानते हुए यहां नाग देवता के मंदिर की स्थापना की गई। तभी से क्षेत्र में नाग देवता की पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है।

वहीं, नाग देवता मंदिर में बुधवार से सप्ताहभर चलने वाली भागवत कथा का भी शुभारंभ हो गया। आयोजकों के अनुसार भागवत कथा का समापन 17 अगस्त को नाग पंचमी के अवसर पर होगा। इस दिन मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना के साथ धार्मिक आयोजन और मेले का भी आयोजन किया जाएगा।

ग्रामीणों का कहना है कि आधुनिक दौर में भी ऐसे धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन पहाड़ की लोक आस्था और परंपराओं को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। डोली यात्रा में नई पीढ़ी की बढ़ती भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि सदियों पुरानी यह धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा आज भी लोगों के बीच उतनी ही आस्था के साथ आगे बढ़ रही है।