ब्यूरो रिपोर्ट

बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान विदेश मंत्री की जिम्मेदारी संभालने वाले तौहीद हुसैन ने भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर कई महत्वपूर्ण दावे किए हैं। उन्होंने कहा कि अंतरिम सरकार के कार्यकाल में बांग्लादेश ने भारत के साथ संबंधों को बेहतर बनाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन उन्हें अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली।


शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश में अंतरिम सरकार का गठन हुआ था। करीब डेढ़ साल के इस कार्यकाल के दौरान भारत और बांग्लादेश के संबंधों में तनाव और असहजता देखने को मिली थी।



तौहीद हुसैन ने एक साक्षात्कार में दावा किया कि बांग्लादेश की ओर से भारत के साथ संवाद बनाए रखने और रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश की गई, लेकिन भारत की ओर से सकारात्मक संकेत नहीं मिले। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच कई मुद्दों को लेकर मतभेद बने रहे।


बांग्लादेश में बाद में तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सरकार बनी। नई सरकार के गठन के बाद उम्मीद जताई गई थी कि भारत और बांग्लादेश के संबंधों में सुधार आएगा, हालांकि कुछ मुद्दों के कारण रिश्तों में चुनौतियां बनी रहीं।
भारत में रह रहीं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को बांग्लादेश वापस भेजने का मुद्दा दोनों देशों के बीच चर्चा का प्रमुख विषय रहा। भारत की ओर से बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को आमंत्रण दिए जाने के बावजूद उनका पहला विदेशी दौरा मलेशिया और चीन का रहा।


हालांकि, बीएनपी सरकार ने भारत के प्रति मोहम्मद यूनुस सरकार जैसा आक्रामक रुख नहीं अपनाया। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दों को लेकर कूटनीतिक स्तर पर असहजता बनी हुई है।


हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में शेख हसीना की वर्चुअल मौजूदगी के बाद बांग्लादेश में भारत के प्रति नाराजगी के स्वर फिर सामने आए। इस घटनाक्रम ने दोनों देशों के संबंधों को लेकर नई बहस को जन्म दिया है।
तौहीद हुसैन के बयान के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर कूटनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच संबंधों को स्थिर रखने के लिए संवाद और आपसी सहयोग बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

