

स्थान : देहरादून
ब्यूरो रिपोर्ट


दीपावली का पर्व नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। दुकानों पर सजावटी सामान, रोशनी की लड़ियों और पूजा सामग्री की खरीदारी को लेकर लोगों में उत्साह देखने को मिल रहा है। वहीं दूसरी ओर मिट्टी के दीये और बर्तन बनाने वाले कुम्हार भी दीपावली की तैयारियों में जुट गए हैं। डोईवाला में वर्षों से मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार रामसिंह प्रजापति भी इस बार दीपावली पर अच्छी बिक्री की उम्मीद लगाए बैठे हैं। हालांकि बाजारों में बढ़ते चाइनीज और आर्टिफिशियल सजावटी सामान ने पारंपरिक कुम्हार व्यवसाय के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।


डोईवाला निवासी रामसिंह प्रजापति बताते हैं कि मिट्टी के बर्तन बनाने का काम उनका पुश्तैनी व्यवसाय है। उनके पिता भी वर्षों तक मिट्टी के बर्तन और दीये बनाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे। पिता से मिली इस पारंपरिक कला को उन्होंने आगे बढ़ाया और करीब 60 वर्षों से स्वयं मिट्टी के बर्तन बनाने का काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि मिट्टी से विभिन्न प्रकार के बर्तन और दीपावली के लिए दीये तैयार करना उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।





रामसिंह प्रजापति ने बताया कि वह मिट्टी से लगभग सभी प्रकार के पारंपरिक बर्तन तैयार करते हैं। विशेष रूप से दीपावली के समय मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ने की उम्मीद रहती है। त्योहार के नजदीक आते ही कुम्हार परिवार दीये बनाने और उन्हें बाजार तक पहुंचाने की तैयारियों में जुट जाते हैं। मिट्टी को आकार देकर दीये तैयार करने की यह कला वर्षों से भारतीय संस्कृति और परंपरा से जुड़ी हुई है।



हालांकि रामसिंह प्रजापति ने बदलते समय के साथ कुम्हारों के सामने आ रही चुनौतियों पर चिंता भी जताई। उन्होंने कहा कि आज बाजारों में चाइनीज लाइटों, इलेक्ट्रॉनिक सजावटी सामान और आर्टिफिशियल वस्तुओं की भरमार हो गई है। लोग आधुनिक सजावट की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे मिट्टी के पारंपरिक दीयों और बर्तनों की मांग प्रभावित हो रही है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में कुम्हारों के पुश्तैनी व्यवसाय को और कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।


कुम्हार रामसिंह प्रजापति का कहना है कि मिट्टी के दीये केवल रोशनी का साधन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और आस्था का प्रतीक भी हैं। दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आज भी बड़ी संख्या में लोग अपने घरों और पूजा स्थलों पर मिट्टी के दीये जलाकर इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि दीपावली की वास्तविक सुंदरता मिट्टी के दीयों की रोशनी में ही दिखाई देती है।

दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दीयों का धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व होता है। घरों के आंगन, मंदिरों और पूजा स्थलों पर जलते दीये सुख-समृद्धि और सकारात्मकता के प्रतीक माने जाते हैं। यही कारण है कि आधुनिक दौर में इलेक्ट्रॉनिक सजावट के बढ़ते चलन के बावजूद मिट्टी के दीयों का महत्व बना हुआ है। कई परिवार आज भी दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाकर अपनी पुरानी परंपराओं को निभा रहे हैं।



रामसिंह प्रजापति ने कहा कि मिट्टी के दीये खरीदने से न केवल घरों में पारंपरिक तरीके से रोशनी होती है, बल्कि कुम्हार परिवारों की आजीविका को भी सहारा मिलता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि दीपावली पर स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीयों और बर्तनों को प्राथमिकता दें। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार को बढ़ावा मिलेगा और वर्षों पुरानी पारंपरिक कला को भी संरक्षण मिल सकेगा।


कुम्हारों को उम्मीद है कि इस वर्ष दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दीयों की अच्छी बिक्री होगी। रामसिंह प्रजापति का कहना है कि दीपावली उनके जैसे कारीगरों के लिए वर्ष का महत्वपूर्ण त्योहार होता है। इस दौरान होने वाली बिक्री से परिवार की आमदनी में सहयोग मिलता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि लोग इस बार भी मिट्टी के दीये खरीदकर अपने घरों को रोशन करेंगे और स्थानीय कुम्हारों के व्यवसाय को मजबूती देंगे।
कुल मिलाकर दीपावली की तैयारियों के बीच डोईवाला के कुम्हारों में उत्साह के साथ भविष्य को लेकर चिंता भी दिखाई दे रही है। एक ओर आधुनिक और चाइनीज सजावटी सामान पारंपरिक व्यवसाय के लिए चुनौती बन रहा है, वहीं दूसरी ओर मिट्टी के दीयों के प्रति लोगों का लगाव कुम्हारों के लिए उम्मीद बनाए हुए है। अब देखना होगा कि इस दीपावली स्थानीय कुम्हारों के बनाए दीये कितने घरों को रोशन करते हैं और उनके पुश्तैनी कारोबार को कितनी मजबूती मिल पाती है।

