
स्थान : देहरादून
ब्यूरो रिपोर्ट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया अभियान को बढ़ावा देने की दिशा में वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक नई पहल सामने आई है। वन्यजीवों की सुरक्षा, निगरानी और बाघ संरक्षण के लिए स्वदेशी तकनीक से निर्मित उपकरण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वन्यजीव वैज्ञानिक बिलाल हबीब और सुमित सभरवाल ने मिलकर एक प्रोजेक्ट सेंटर की शुरुआत की है। इस पहल का उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण में इस्तेमाल होने वाले विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम करना और भारतीय तकनीक को बढ़ावा देना है।

वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में शुरू किए गए इस प्रोजेक्ट सेंटर के माध्यम से रेडियो कॉलर, कैमरा ट्रैप और ड्रोन जैसे आधुनिक उपकरणों के स्वदेशी निर्माण तथा उपलब्धता पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इन उपकरणों का उपयोग जंगलों में रहने वाले वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखने, उनकी लोकेशन पता करने और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े वैज्ञानिक अध्ययनों में किया जाता है। इस पहल को भारतीय वन्यजीव अनुसंधान और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।





प्रोजेक्ट सेंटर की शुरुआत को लेकर सुमित सभरवाल ने बताया कि वर्ष 2023 में मैसूर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाघ संरक्षण से जुड़े कार्यक्रम के दौरान मेक इन इंडिया के तहत वन्यजीव संरक्षण में उपयोग होने वाले उपकरणों को भारत में विकसित करने का आह्वान किया था। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के इसी संदेश से प्रेरित होकर स्वदेशी उपकरणों के निर्माण और तकनीकी विकास के प्रयासों को आगे बढ़ाया गया।

सुमित सभरवाल ने बताया कि रेडियो कॉलर, कैमरा ट्रैप और ड्रोन जैसे उपकरण वन्यजीवों की सुरक्षा तथा वैज्ञानिक निगरानी के लिए बेहद आवश्यक हैं। इन उपकरणों के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से भारतीय वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के सहयोग से काम शुरू किया गया। इसी प्रयास के तहत अब ‘वनरक्षक’ नाम से रिटेल कम प्रोजेक्ट सेंटर की स्थापना की गई है।

उन्होंने कहा कि वनरक्षक प्रोजेक्ट सेंटर का उद्देश्य वन विभागों, वन्यजीव शोधकर्ताओं और संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं को स्वदेशी तकनीक पर आधारित आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराना है। इससे वन्यजीवों की निगरानी और संरक्षण के कार्यों में भारतीय तकनीक के उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही स्वदेशी उपकरणों के विकास से अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में भी नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
इस अवसर पर वन्यजीव एवं बाघ संरक्षण वैज्ञानिक बिलाल हबीब ने बताया कि वन्यजीवों की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक विकसित करने की दिशा में वर्ष 2006-07 से प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में बाघों की निगरानी और गणना से संबंधित उपकरणों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। विशेष रूप से कैमरा ट्रैप जैसे उपकरणों को विदेश से आयात करना पड़ता था, जिससे भारतीय वैज्ञानिकों के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां आती थीं।



बिलाल हबीब ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान के दौरान यह महसूस किया गया कि जब भारत में वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में विशेषज्ञता उपलब्ध है, तो इन उपकरणों को देश में ही विकसित करने की दिशा में भी प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिकों ने स्वदेशी तकनीक पर आधारित बेहतर उपकरण तैयार करने का विचार प्रस्तुत किया, जिसे सुमित सभरवाल ने तकनीकी पहल और पूंजीगत निवेश के माध्यम से आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वन्यजीव संरक्षण के लिए रेडियो कॉलर और कैमरा ट्रैप जैसे उपकरण बेहद उपयोगी माने जाते हैं। रेडियो कॉलर के माध्यम से बाघ, हाथी और अन्य वन्यजीवों की गतिविधियों तथा उनके आवागमन की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। वहीं कैमरा ट्रैप की सहायता से जंगलों में वन्यजीवों की मौजूदगी, उनकी संख्या के आकलन और व्यवहार से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई जाती है। ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल दुर्गम वन क्षेत्रों की निगरानी और संरक्षण संबंधी कार्यों में किया जा सकता है।
स्वदेशी उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा मिलने से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूती मिल सकती है। विदेशी उपकरणों के आयात पर निर्भरता कम होने के साथ ही भारतीय परिस्थितियों के अनुसार उपकरणों के विकास की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। इससे वन विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों को वन्यजीवों की निगरानी तथा अनुसंधान के लिए स्थानीय स्तर पर तकनीकी समाधान उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

फिलहाल वन्यजीव वैज्ञानिक बिलाल हबीब और सुमित सभरवाल की संयुक्त पहल के रूप में शुरू किया गया वनरक्षक प्रोजेक्ट सेंटर मेक इन इंडिया अभियान से जुड़े एक नए प्रयास के रूप में सामने आया है। इस पहल के माध्यम से वन्यजीव संरक्षण में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक उपकरणों को स्वदेशी तकनीक से विकसित करने और उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है। आने वाले समय में यह प्रयास भारतीय वन्यजीव संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी आत्मनिर्भरता को किस स्तर तक मजबूत करेगा, यह उपकरणों के विकास और उनके व्यावहारिक इस्तेमाल से स्पष्ट होगा।

