रामनगर के पूछड़ी में बुलडोजर कार्रवाई पर विवाद तेज, ताराचंद घिल्डियाल ने वन विभाग पर लगाए गंभीर आरोप

रामनगर के पूछड़ी में बुलडोजर कार्रवाई पर विवाद तेज, ताराचंद घिल्डियाल ने वन विभाग पर लगाए गंभीर आरोप

स्थान : रामनगर
ब्यूरो रिपोर्ट

उत्तराखंड के रामनगर स्थित पूछड़ी क्षेत्र में वन विभाग की अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद विरोध के स्वर लगातार तेज होते जा रहे हैं। वन भूमि से अतिक्रमण हटाने के अभियान में 81 संरचनाओं को ध्वस्त किए जाने के बाद प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और कार्रवाई की वैधानिकता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। नेकी की दीवार के संयोजक ताराचंद घिल्डियाल ने उत्तराखंड सरकार और वन विभाग की कार्रवाई को असंवैधानिक बताते हुए वन अधिकार अधिनियम 2006 के प्रावधानों की अनदेखी का आरोप लगाया है। उन्होंने मांग की है कि वन ग्रामों में रहने वाले परिवारों के अधिकारों का निर्धारण किए बिना इस तरह की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

रामनगर के पूछड़ी क्षेत्र में 31 अक्टूबर को प्रशासन, पुलिस और वन विभाग की संयुक्त टीम ने बड़े स्तर पर अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया था। इस दौरान भारी पुलिस बल की मौजूदगी में बुलडोजरों की सहायता से 81 संरचनाओं को ध्वस्त किया गया। कार्रवाई के बाद कई प्रभावित परिवारों के सामने रहने का संकट खड़ा हो गया है। इसी को लेकर स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने सरकार तथा वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

नेकी की दीवार के संयोजक ताराचंद घिल्डियाल ने आरोप लगाया कि पूछड़ी में की गई ध्वस्तीकरण की कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। उनका कहना है कि किसी भी परिवार को उसके आवास से बेदखल करने से पहले संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन होना चाहिए और प्रभावित लोगों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि वन ग्रामों में लंबे समय से निवास कर रहे परिवारों के अधिकारों को लेकर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

घिल्डियाल ने वन अधिकार अधिनियम 2006 का हवाला देते हुए कहा कि वन ग्रामों, उनके तोकों और खत्तों में निवास करने वाले परिवारों की पहचान करना तथा उनका विधिवत रिकॉर्ड तैयार करना आवश्यक है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने अभी तक सभी संबंधित वन ग्रामों और वहां रहने वाले परिवारों की सूची तैयार कर आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी नहीं की हैं। उनका कहना है कि अधिकारों के दावों का निस्तारण किए बिना बेदखली की कार्रवाई करना प्रभावित लोगों के साथ अन्याय है।

ताराचंद घिल्डियाल ने दावा किया कि नैनीताल हाईकोर्ट ने आठ मई 2024 को भी वन अधिकार क्षेत्र में आने वाले गांवों की सूची प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। उनके अनुसार, संबंधित विभागों को वन ग्रामों की पहचान और उनके रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी स्तर पर इन प्रक्रियाओं को पूरा करने में देरी हुई है, जिसका खामियाजा अब वन ग्रामों में रहने वाले परिवारों को भुगतना पड़ रहा है।

उन्होंने हाल में हुई हाईकोर्ट की सुनवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालय के समक्ष वन ग्रामों की सूची, सरकारी भूमि की जियो मैपिंग और ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से संबंधित क्षेत्रों का रिकॉर्ड तैयार करने का विषय भी उठा था। घिल्डियाल के अनुसार, न्यायालय ने सरकारी भूमि का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने और संबंधित क्षेत्रों की सीमाओं को स्पष्ट करने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि इससे वन भूमि और अन्य सरकारी भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

नैनीताल हाईकोर्ट में हुई सुनवाई को लेकर प्रकाशित समाचारों के अनुसार, न्यायालय ने रामनगर के पूछड़ी और रानीखेत रोड क्षेत्र के प्रभावित लोगों को अपना पक्ष रखने का अवसर देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही संबंधित मामलों में चार माह तक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पर रोक लगाए जाने की जानकारी भी सामने आई है। न्यायालय ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित उच्चस्तरीय समिति से तीन सप्ताह के भीतर स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने और संबंधित विभागों से सरकारी भूमि की जियो मैपिंग कराने को भी कहा है। हालांकि, इन निर्देशों का किन निर्माणों और मामलों पर प्रभाव पड़ेगा, यह न्यायालय के लिखित आदेश तथा संबंधित कानूनी स्थिति से स्पष्ट होगा।

घिल्डियाल ने कहा कि हाईकोर्ट के निर्देशों के मद्देनजर प्रभावित परिवारों के अधिकारों और उनकी कानूनी स्थिति की समीक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने मांग की कि वन ग्रामों में रहने वाले परिवारों की सूची तैयार कर उनके दावों का नियमानुसार निस्तारण किया जाए। उनका कहना है कि जिन परिवारों ने वर्षों से इन क्षेत्रों में रहकर अपना जीवन बिताया है, उनके आवास और भविष्य से जुड़े सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

वहीं, नेकी की दीवार के संयोजक ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान मीडिया को घटनास्थल पर जाने से रोके जाने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की स्वतंत्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है और जनहित से जुड़े मामलों में पत्रकारों को घटनास्थल की वास्तविक स्थिति सामने लाने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से इस तरह की कार्रवाई के दौरान पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की।

दूसरी ओर, तराई पश्चिमी वन प्रभाग के अधिकारियों का कहना है कि पूछड़ी में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई। डीएफओ पुनीत तोमर के अनुसार, कार्रवाई से पहले दस्तावेजों की जांच की गई थी और जिन मामलों में न्यायालय का स्थगन आदेश था, वन अधिकार अधिनियम से संबंधित प्रक्रिया लंबित थी या बेदखली की कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी, उन्हें अभियान से अलग रखा गया। वन विभाग का दावा है कि सभी आवश्यक प्रक्रियाओं के बाद ही 81 संरचनाओं को ध्वस्त करने के लिए चिह्नित किया गया था।

फिलहाल रामनगर के पूछड़ी क्षेत्र में हुई बुलडोजर कार्रवाई को लेकर वन विभाग और प्रभावित परिवारों का समर्थन कर रहे सामाजिक संगठनों के बीच मतभेद सामने आए हैं। एक ओर वन विभाग कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप बता रहा है, वहीं दूसरी ओर ताराचंद घिल्डियाल और अन्य लोग वन अधिकार अधिनियम तथा न्यायालय के निर्देशों का हवाला देकर सवाल उठा रहे हैं। अब निगाहें सरकार, वन विभाग और जिला प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, वन ग्रामों के अधिकारों और न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन को लेकर आगे क्या निर्णय लिया जाएगा।