
स्थान : खटीमा
रिपोर्टर : अशोक सरकार

उत्तराखंड के खटीमा में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनीता चौधरी ममता, संघर्ष और सेवा की अनूठी मिसाल पेश कर रही हैं। ऑटिज्म से प्रभावित बेटे की मां होने के अपने अनुभव को उन्होंने अपनी ताकत बनाया और आज विशेष जरूरतों वाले बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम में जुटी हैं। उनके सेंटर में नेपाल, हल्द्वानी और पहाड़ी क्षेत्रों से भी बच्चे प्रशिक्षण लेने पहुंच रहे हैं।

डॉ. अनीता चौधरी के बेटे में जब ऑटिज्म की पहचान हुई, तो उन्होंने हार मानने के बजाय देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में जाकर प्रशिक्षण लिया। खटीमा लौटने पर उन्हें एहसास हुआ कि आर्थिक तंगी और जागरूकता की कमी के चलते कई परिवार अपने बच्चों को जरूरी प्रशिक्षण नहीं दिला पा रहे हैं। इसके बाद उन्होंने महज दो-तीन बच्चों के साथ एक छोटे से सेंटर की शुरुआत की, जो आज सैकड़ों विशेष बच्चों और उनके परिवारों के लिए उम्मीद का केंद्र बन चुका है।




डॉ. अनीता बताती हैं कि उनका बेटा अब 19 वर्ष का है और वर्षों के प्रशिक्षण के बाद अपने कई काम खुद करने लगा है। वह 12वीं कक्षा में पढ़ रहा है। बेटे में आए सकारात्मक बदलावों ने उन्हें दूसरे बच्चों को भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रेरित किया।


उनके सेंटर में बच्चों को ड्राइंग, कुकिंग, क्राफ्ट और कंप्यूटर जैसी गतिविधियां सिखाई जाती हैं। यहां बच्चों की रुचि और क्षमता के अनुसार उन्हें कौशल प्रशिक्षण दिया जाता है। सेंटर में प्रशिक्षण लेने वाले कुछ बच्चों ने टाइपिंग सीखकर रोजगार भी हासिल किया है।


आस्थावी से आईं रीमा राणा ने बताया कि उनके बच्चे में भी लगातार सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले बच्चे को बोलने में परेशानी होती थी, लेकिन अब वह ‘मम्मी-पापा’ जैसे शब्द बोलने लगा है। यह बदलाव परिवार के लिए बड़ी खुशी और उम्मीद लेकर आया है।

डॉ. अनीता चौधरी का कहना है कि विशेष जरूरतों वाले बच्चों को दया नहीं, बल्कि सम्मान, अपनापन और समान अवसरों की जरूरत है। समाज को चाहिए कि वह इन बच्चों की क्षमताओं और हुनर को पहचाने तथा उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने में सहयोग करे।



खटीमा की डॉ. अनीता चौधरी की यह पहल संदेश देती है कि एक मां का संघर्ष केवल उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सैकड़ों परिवारों के लिए उम्मीद की नई राह खोल सकता है। विशेष बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की उनकी मुहिम समाज के लिए प्रेरणादायक उदाहरण है।

