स्थान : देहरादून
ब्यूरो रिपोर्ट


पौड़ी के चर्चित 144 नाली भूमि खरीद मामले को लेकर अधिवक्ता सेवा मंच एवं पहाड़ स्वाभिमान सेना उत्तराखंड ने मंगलवार को पत्रकार वार्ता की। इस दौरान संगठनों ने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि खरीद-फरोख्त, भू-कानून के कथित दुरुपयोग और कृषि भूमि को छोटे-छोटे भूखंडों में बदलकर बेचे जाने के मामलों पर गंभीर चिंता जताई।


अधिवक्ता संदीप चमोली ने आरोप लगाया कि पौड़ी गढ़वाल के एराड़ी गांव में दून हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड ने करीब 144 नाली भूमि कृषि प्रयोजन के लिए खरीदी थी। आरोप है कि रजिस्ट्री के बाद इस भूमि को छोटे-छोटे भूखंडों में बांटकर बाहरी लोगों को बेचने की प्रक्रिया की जा रही है। उन्होंने मामले की विस्तृत जांच की मांग की।



संदीप चमोली ने कंपनी के गठन और संपत्ति से जुड़े दावों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि कंपनी का गठन वर्ष 1995 में हुआ था, जबकि वर्ष 2003 से पहले की संपत्तियों को लेकर भी दावे किए जा रहे हैं। वहीं वर्तमान निदेशकों की नियुक्ति वर्ष 2016 के बाद की बताई जा रही है। ऐसे में कंपनी की भूमि और स्वामित्व संबंधों की कानूनी जांच जरूरी है।

पत्रकार वार्ता में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि पुरानी कंपनियों के माध्यम से भू-कानून के प्रावधानों को दरकिनार करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने लैंसडौन और यमकेश्वर क्षेत्रों में भूमि कारोबार के साथ ही कैटल गांव में आश्रम निर्माण से जुड़े मामलों की भी उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की।
संगठनों ने वन क्षेत्रों से रास्ते बनाने, भूजल के लिए बोरिंग करने तथा कृषि भूमि पर व्यावसायिक गतिविधियां संचालित किए जाने के मामलों की भी जांच की मांग उठाई। उनका कहना था कि पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि के उपयोग और खरीद-फरोख्त से जुड़े नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।


अधिवक्ता सेवा मंच और पहाड़ स्वाभिमान सेना ने भू-कानून की धारा 154 की समीक्षा करने की मांग की। साथ ही उन्होंने राज्य में और अधिक प्रभावी एवं कठोर भू-कानून लागू करने तथा पुरानी कंपनियों के नाम दर्ज भूमि का जनपदवार ऑडिट कराने की अपील की।



अधिवक्ता संदीप चमोली ने बताया कि बुधवार को गढ़वाल कमिश्नर को शिकायत पत्र सौंपने के साथ ही संबंधित दस्तावेज भी उपलब्ध कराए जाएंगे। उन्होंने कहा कि दस्तावेजों के आधार पर भूमि खरीद और उसके बाद किए जा रहे कथित भूखंडीकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की जमीन आने वाली पीढ़ियों की विरासत है और इसे बाहरी नियंत्रण से बचाना जरूरी है। संगठनों ने सरकार से पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि खरीद-फरोख्त के मामलों की गंभीरता से जांच कर नियमों के उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग की।


