झारखंड में युवाओं का विधानसभा मार्च, जानिए प्रदर्शन के कानूनी नियम

झारखंड में युवाओं का विधानसभा मार्च, जानिए प्रदर्शन के कानूनी नियम

ब्यूरो रिपोर्टर

झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी की भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं के विरोध में युवाओं का विधानसभा मार्च सोमवार को जारी रहा। प्रदर्शनकारी युवाओं ने भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, कथित धांधली की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर राजधानी में प्रदर्शन किया।

मार्च में पिछले कई दिनों से अनशन कर रहे छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो भी शामिल हुए। छात्रों का एक वर्ग उन्हें स्ट्रेचर पर लेकर विधानसभा की ओर आगे बढ़ा। इस दौरान कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग हटाकर आगे बढ़ने का प्रयास किया, जिसके चलते पुलिस के साथ उनकी धक्का-मुक्की भी हुई।

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने कई स्थानों पर पानी की बौछार का इस्तेमाल किया। कुछ जगहों से लाठीचार्ज की खबरें भी सामने आईं। हालांकि पुलिस की ओर से स्थिति को नियंत्रण में रखने का प्रयास किया गया और प्रदर्शनकारियों को निर्धारित क्षेत्र में रोकने की कोशिश की गई।

प्रदर्शनकारी युवाओं की सबसे बड़ी मांग जेएसएससी-सीजीएल समेत विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में हुई कथित अनियमितताओं और पेपर लीक की स्वतंत्र जांच कराने की है। प्रदर्शनकारी इस मामले की जांच सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसी से कराने की मांग कर रहे हैं।

छात्र नेताओं के अनुसार, वर्ष 2019 के बाद आयोजित जेएसएससी-सीजीएल, जेएसएससी जूनियर इंजीनियर और पीजीटी समेत कई भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने की मांग की जा रही है। उनका दावा है कि वे कुल 13 परीक्षाओं को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार तीन परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमत हुई है।

इसके अलावा अभ्यर्थियों ने परीक्षाओं के श्रेणीवार कटऑफ जारी करने और परीक्षार्थियों की ओएमआर शीट तथा रिस्पॉन्स शीट सार्वजनिक करने की मांग की है। प्रदर्शनकारी कथित पेपर लीक, धांधली और भ्रष्टाचार में शामिल अधिकारियों, कर्मचारियों और बिचौलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की भी मांग कर रहे हैं।

युवाओं की मांग है कि भर्ती प्रक्रिया को समयबद्ध, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाया जाए, ताकि परीक्षा में बार-बार होने वाली कथित गड़बड़ियों और परिणाम जारी होने में देरी का असर अभ्यर्थियों के भविष्य पर न पड़े।

भारतीय संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार प्राप्त है।

हालांकि यह अधिकार पूर्ण या असीमित नहीं है। अनुच्छेद 19(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा तथा भारत की संप्रभुता और अखंडता जैसे हितों में उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसलिए किसी प्रदर्शन या मार्च के दौरान लागू स्थानीय प्रशासनिक आदेशों, निर्धारित मार्ग और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े नियमों का पालन करना जरूरी होता है।

किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन को केवल असहमति के आधार पर बलपूर्वक दबाना उचित नहीं है। लेकिन यदि भीड़ कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है, हिंसा करती है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाती है या वैध आदेशों का उल्लंघन करते हुए स्थिति बिगड़ती है, तो कानून के तहत पुलिस को स्थिति नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने की शक्ति मिल सकती है।

ऐसी स्थिति में बल का इस्तेमाल कानूनसम्मत, आवश्यक और परिस्थितियों के अनुपात में होना चाहिए। सामान्य तौर पर पुलिस पहले भीड़ को चेतावनी देकर हटने का निर्देश दे सकती है और परिस्थितियों के अनुसार पानी की बौछार जैसे अपेक्षाकृत कम घातक उपायों का इस्तेमाल कर सकती है। बल प्रयोग की वैधता हमेशा मौके की वास्तविक परिस्थितियों और लागू कानूनों पर निर्भर करती है।

झारखंड में जारी आंदोलन के बीच फिलहाल छात्रों की मांगों और सरकार के बीच गतिरोध बना हुआ है। एक ओर प्रदर्शनकारी भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों की व्यापक जांच और पारदर्शी व्यवस्था की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन के सामने विधानसभा और राजधानी की कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती है।