हरिद्वार में रावण दहन पर छिड़ी बहस, मानवाधिकार आयोग पहुंचा मामला

हरिद्वार में रावण दहन पर छिड़ी बहस, मानवाधिकार आयोग पहुंचा मामला

स्थान : हरिद्वार
रिपोर्टर : धर्मराज

दशहरे पर रावण दहन की सदियों पुरानी परंपरा को लेकर हरिद्वार में नई बहस शुरू हो गई है। अधिवक्ता अरुण भदौरिया ने रावण के विद्वतापूर्ण, धार्मिक और सांस्कृतिक पक्षों को सामने रखने की मांग करते हुए उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग में याचिका दायर की है। याचिका में रावण के पुतले का दहन रोकने के बजाय ज्ञान, विद्वता, नैतिकता और सामाजिक सुधार से जुड़े कार्यक्रम आयोजित करने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि रावण को केवल नकारात्मक पात्र के रूप में देखने के बजाय उसकी विद्वता, शिव भक्ति, संगीत और शास्त्रीय ज्ञान से जुड़े पहलुओं पर भी चर्चा होनी चाहिए। उनका तर्क है कि रावण के व्यक्तित्व के इन पक्षों से युवा पीढ़ी को परिचित कराया जाना चाहिए, ताकि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के विभिन्न पहलुओं को समझने का अवसर मिल सके।

याचिका में गृह विभाग, संस्कृति विभाग, पुलिस महानिदेशक, जिला प्रशासन, नगर निकायों और दशहरा आयोजन समितियों को पक्षकार बनाया गया है। इसमें पर्यावरण संरक्षण, अग्नि सुरक्षा और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा देने की मांग भी की गई है। अधिवक्ता अरुण भदौरिया ने कहा है कि यदि राज्य मानवाधिकार आयोग इस मामले में संज्ञान नहीं लेता है, तो वह उत्तराखंड हाईकोर्ट का रुख करेंगे।

संत समाज ने बताया बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक

याचिका सामने आने के बाद हरिद्वार के संत समाज और श्रीरामलीला समिति की ओर से भी प्रतिक्रिया आई है। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत डॉ. रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि रावण दहन सदियों से चली आ रही परंपरा है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है।

वहीं, श्रीरामलीला समिति के प्रदीप सैनी ने रावण को महान विद्वान और पंडित बताते हुए कहा कि रावण दहन को ब्राह्मण समाज से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, यह किसी व्यक्ति या समाज का अपमान करने की परंपरा नहीं, बल्कि बुराई के अंत का प्रतीकात्मक संदेश है।

आयोग के रुख पर टिकी निगाहें

रावण दहन को लेकर दायर याचिका ने धार्मिक परंपरा, रावण की विद्वता और दशहरे के प्रतीकात्मक संदेश को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। एक ओर याचिकाकर्ता रावण के विद्वतापूर्ण पक्ष को अधिक महत्व देने और वैकल्पिक कार्यक्रम आयोजित करने की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर संत समाज इसे बुराई पर अच्छाई की विजय से जुड़ी परंपरा बता रहा है।

अब इस मामले में राज्य मानवाधिकार आयोग के रुख पर निगाहें टिकी हैं। यदि आयोग में याचिका पर आगे सुनवाई होती है या याचिकाकर्ता हाईकोर्ट जाते हैं, तो धार्मिक परंपरा और उसके सांस्कृतिक पक्षों को लेकर बहस आगे बढ़ सकती है। फिलहाल, याचिका पर आयोग की ओर से किसी निर्णय की जानकारी उपलब्ध नहीं है।