हरिद्वार के अखाड़ों में निभाई गई शस्त्र पूजन की सदियों पुरानी परंपरा

हरिद्वार के अखाड़ों में निभाई गई शस्त्र पूजन की सदियों पुरानी परंपरा

स्थान : हरिद्वार
ब्यूरो रिपोर्ट

धर्मनगरी हरिद्वार में दशहरे के अवसर पर विभिन्न अखाड़ों में सदियों पुरानी शस्त्र पूजन की परंपरा विधि-विधान के साथ निभाई गई। इस दौरान नागा संन्यासियों ने पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों के साथ आधुनिक हथियारों का भी पूजन किया। अखाड़ों में शस्त्र पूजन को धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है।

कनखल स्थित पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े में शस्त्र पूजन के दौरान सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश नामक भालों की विशेष पूजा-अर्चना की गई। अखाड़े की परंपरा में इन भालों को देव स्वरूप माना जाता है। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से इनका विशेष महत्व है।

अखाड़ों में शस्त्र पूजन की परंपरा आदि गुरु शंकराचार्य से जुड़ी दशनामी संन्यासी परंपरा का हिस्सा है। दशहरे के दिन नागा संन्यासी प्राचीन रीति-रिवाजों के अनुसार अस्त्र-शस्त्रों की पूजा कर अपनी परंपराओं का निर्वहन करते हैं।

कुंभ मेले के दौरान अखाड़ों की पेशवाई में सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश भाले सबसे आगे चलते हैं। इन भालों को अखाड़े की धार्मिक परंपरा और पहचान से जोड़कर देखा जाता है। पेशवाई में इनकी अग्रणी भूमिका अखाड़ों की सदियों पुरानी परंपरा को दर्शाती है।

वहीं, कुंभ के शाही स्नान के अवसर पर इन भालों को सबसे पहले गंगा स्नान कराया जाता है। इसके बाद अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर, महामंडलेश्वर और अन्य संत-महात्मा गंगा में स्नान करते हैं। यह क्रम अखाड़ों की परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप निभाया जाता है।

दशहरे पर हरिद्वार के अखाड़ों में हुए शस्त्र पूजन के माध्यम से संतों ने अपनी प्राचीन परंपराओं को आगे बढ़ाया। धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा यह आयोजन हरिद्वार की अखाड़ा परंपरा की विशिष्ट पहचान को भी रेखांकित करता है।