आरटीआई से मंडी की सफाई व्यवस्था पर उठे सवाल, कर्मचारियों की संख्या और भुगतान में गड़बड़ी के आरोप

आरटीआई से मंडी की सफाई व्यवस्था पर उठे सवाल, कर्मचारियों की संख्या और भुगतान में गड़बड़ी के आरोप

स्थान : हल्द्वानी
रिपोर्टर : पंकज सक्सेना

मंडियों में सफाई व्यवस्था को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच सूचना के अधिकार (आरटीआई) से प्राप्त जानकारी के आधार पर कथित अनियमितताओं का मामला सामने आया है। आरटीआई कार्यकर्ता अमित कुमार का दावा है कि मंडी समिति में सफाई व्यवस्था के लिए किए गए ठेके और कर्मचारियों से संबंधित रिकॉर्ड में कई ऐसी विसंगतियां सामने आई हैं, जिनकी जांच की आवश्यकता है। उनका आरोप है कि सफाई के नाम पर खर्च होने वाली धनराशि के बावजूद मंडियों में अपेक्षित सफाई व्यवस्था दिखाई नहीं देती।

अमित कुमार के अनुसार, उनके द्वारा मंडी समिति से सफाई कर्मचारियों और ठेके से संबंधित विभिन्न सूचनाएं मांगी गई थीं। प्राप्त जानकारी के आधार पर उनका कहना है कि ठेकेदार के साथ किए गए अनुबंध में कर्मचारियों को वेतन बैंक खातों में आरटीजीएस के माध्यम से दिए जाने तथा कर्मचारियों के पीएफ आदि की कटौती किए जाने की शर्तें शामिल थीं। हालांकि, उनके मुताबिक उपलब्ध कराई गई सूचना में इन प्रावधानों के पालन से संबंधित पर्याप्त दस्तावेज सामने नहीं आए हैं।

आरटीआई कार्यकर्ता का आरोप है कि कुछ कर्मचारियों को कथित तौर पर मात्र तीन हजार रुपये प्रतिमाह दिए जाने की बात सामने आई है। उनका कहना है कि इस भुगतान का भी समुचित लेखा-जोखा उन्हें उपलब्ध कराई गई सूचना में नहीं मिला। ऐसे में कर्मचारियों को वास्तविक रूप से कितना भुगतान किया गया और अनुबंध में निर्धारित शर्तों का कितना पालन हुआ, इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

मामले में कर्मचारियों की संख्या को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। अमित कुमार के अनुसार, हल्द्वानी मंडी में रिकॉर्ड में दस कर्मचारी कार्यरत बताए गए हैं, जबकि मौके पर केवल चार कर्मचारी काम करते हुए दिखाई दिए। उनका कहना है कि इसी तरह किच्छा मंडी समेत अन्य मंडियों से संबंधित कर्मचारियों की जानकारी में भी विसंगतियां दिखाई देती हैं। उन्होंने पूरे उत्तराखंड की मंडियों में कार्यरत सफाई कर्मचारियों की सूची और वास्तविक स्थिति की जांच की मांग की है।

अमित कुमार ने मंडियों में जेसीबी की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठाया है। उनके मुताबिक अनुबंध की शर्तों में प्रत्येक मंडी के लिए एक जेसीबी की व्यवस्था का प्रावधान बताया गया है, लेकिन किसी भी मंडी में जेसीबी उपलब्ध दिखाई नहीं दी। इसके बावजूद संबंधित कार्यों में जेसीबी के किराये का खर्च दर्शाए जाने का दावा किया गया है। इस बिंदु की भी जांच की आवश्यकता बताई जा रही है।

आरटीआई कार्यकर्ता का कहना है कि उन्हें मांगी गई सूचनाओं में से कुछ जानकारी अधूरी उपलब्ध कराई गई। उनका आरोप है कि जब उत्तराखंड की सभी मंडियों में कार्यरत कर्मचारियों की सूची मांगी गई तो उपलब्ध कराई गई जानकारी में हल्द्वानी और किच्छा मंडी से संबंधित कर्मचारियों के नामों को लेकर भी सवाल सामने आए। उनका कहना है कि दस्तावेजों और जमीनी स्थिति का मिलान किए जाने पर वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकती है।

मामले को लेकर मंडी समिति के अधिकारियों का कहना है कि आरटीआई के तहत जो सूचनाएं उपलब्ध थीं, वही आवेदक को उपलब्ध कराई गई हैं। वहीं, अमित कुमार ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए अनुबंध की शर्तों, कर्मचारियों की वास्तविक संख्या, वेतन भुगतान, पीएफ कटौती और जेसीबी के किराये से संबंधित रिकॉर्ड की जांच कराने की बात कही है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

सफाई व्यवस्था और सरकारी धन के उपयोग से जुड़े इन सवालों के सामने आने के बाद अब निगरानी और जांच की मांग तेज हो गई है। यदि दस्तावेजों और मौके की स्थिति में अंतर पाया जाता है तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार की भूमिका की जांच की आवश्यकता होगी। वहीं, पूरे मामले में संबंधित पक्षों का विस्तृत पक्ष सामने आने और आधिकारिक जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है।