
ब्यूरो रिपोर्ट


अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में बहुमत हासिल कर अमेरिकी राजनीति का समीकरण बदल दिया है। इस चुनावी नतीजे का असर केवल अमेरिका की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक संबंधों पर भी पड़ सकता है। ईरान युद्ध, कच्चे तेल की कीमतें, भारत-अमेरिका व्यापार समझौता, एच-1बी वीजा और शेयर बाजार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे अब नए राजनीतिक समीकरणों से प्रभावित हो सकते हैं।


अमेरिका में सत्ता का संतुलन बदलने से राष्ट्रपति ट्रंप के लिए अपनी नीतियों को आगे बढ़ाना पहले की तुलना में चुनौतीपूर्ण हो सकता है। कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की मजबूत स्थिति के चलते सरकार के फैसलों पर निगरानी बढ़ने और कई प्रस्तावों पर राजनीतिक टकराव की संभावना है। हालांकि, राष्ट्रपति के पास वीटो सहित कई संवैधानिक अधिकार मौजूद हैं, लेकिन महत्वपूर्ण कानूनों, बजट और सैन्य खर्च से संबंधित मामलों में विपक्ष का दबाव बढ़ सकता है।




ईरान के साथ जारी तनाव और युद्ध अमेरिकी राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल है। चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को मिली हार के बाद ट्रंप प्रशासन पर सैन्य कार्रवाई सीमित करने और कूटनीतिक समाधान तलाशने का दबाव बढ़ सकता है। अमेरिकी सैन्य खर्च और युद्ध के कारण बढ़ती ऊर्जा कीमतों को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, चुनावी नतीजों का मतलब तत्काल युद्ध समाप्त होना नहीं है। अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम की कोशिशों तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही से जुड़े फैसलों पर दुनिया की नजर बनी हुई है।


ईरान युद्ध में कमी आने या स्थायी संघर्षविराम होने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को राहत मिल सकती है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतें कम होने से देश का आयात बिल घट सकता है और इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम तथा हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी तेल विपणन कंपनियों को फायदा मिल सकता है। इससे महंगाई पर दबाव घटने की भी उम्मीद है। हालांकि, पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कमी अंतरराष्ट्रीय बाजार के साथ करों और सरकारी नीतियों पर भी निर्भर करेगी।



भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर भी अमेरिकी चुनाव परिणामों का असर देखने को मिल सकता है। डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद टैरिफ, ऊर्जा, निवेश और विनिर्माण से जुड़ी शर्तों की समीक्षा की मांग कर सकते हैं। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ताओं में देरी या कुछ शर्तों में बदलाव की संभावना बन सकती है। हालांकि, भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंध मजबूत करने को लेकर अमेरिका की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में व्यापक सहमति रही है। इसलिए व्यापार समझौते के पूरी तरह पटरी से उतरने की आशंका फिलहाल सीमित मानी जा रही है।
अमेरिका में काम करने वाले भारतीय पेशेवरों के लिए एच-1बी वीजा नीति भी महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। ट्रंप प्रशासन की सख्त आव्रजन नीतियों और नए एच-1बी वीजा आवेदनों पर एक लाख डॉलर की फीस संबंधी व्यवस्था को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। डेमोक्रेट्स की मजबूती के बाद कांग्रेस में इन नीतियों की निगरानी और समीक्षा की मांग बढ़ सकती है। हालांकि, आव्रजन व्यवस्था में तत्काल बड़े बदलाव की गारंटी नहीं है। इसका असर भारतीय आईटी पेशेवरों, अमेरिकी कंपनियों और विदेश में रोजगार की तैयारी कर रहे युवाओं पर पड़ सकता है।



पाकिस्तान के साथ अमेरिका के संबंध भी भारत के लिए कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बने रहेंगे। डेमोक्रेटिक सांसद ट्रंप प्रशासन के पाकिस्तान के साथ कारोबारी और राजनीतिक संबंधों की पड़ताल की मांग कर सकते हैं। विशेष रूप से क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े कथित कारोबारी समझौतों और हितों के टकराव के आरोपों पर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, ऐसे आरोपों की स्वतंत्र जांच और पुष्टि आवश्यक होगी। दूसरी ओर, भारत-पाकिस्तान संबंधों और संघर्षविराम को लेकर ट्रंप के बयानों पर भी नई राजनीतिक बहस देखने को मिल सकती है।


अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ने की संभावना है। वैश्विक निवेशक अमेरिका की आर्थिक नीतियों, डॉलर की मजबूती, ब्याज दरों और कच्चे तेल की कीमतों पर नजर बनाए हुए हैं। यदि ईरान के साथ तनाव कम होता है और तेल की कीमतों में गिरावट आती है, तो भारतीय बाजार को सकारात्मक संकेत मिल सकते हैं। वहीं, अमेरिकी राजनीतिक गतिरोध या व्यापार नीतियों में अनिश्चितता बढ़ने से विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर अमेरिकी मध्यावधि चुनाव ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की बढ़ी ताकत से विदेश नीति, सैन्य खर्च, व्यापार और आव्रजन जैसे मुद्दों पर प्रशासन को ज्यादा सवालों का सामना करना पड़ सकता है। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि बदले हुए राजनीतिक समीकरणों के बीच अमेरिका की आर्थिक और रणनीतिक नीतियां किस दिशा में आगे बढ़ती हैं। आने वाले महीनों में ईरान संकट का समाधान, तेल की कीमतें और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताएं भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाले अहम कारक साबित हो सकते हैं।

