
स्थान : विकासनगर
ब्यूरो रिपोर्ट


दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही विकासनगर के बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। रंग-बिरंगी इलेक्ट्रॉनिक झालरों, आकर्षक लाइटों, मोमबत्तियों और सजावटी सामान से दुकानें सज चुकी हैं। लोग अपने घरों और प्रतिष्ठानों को रोशन करने के लिए बाजारों में खरीदारी कर रहे हैं। लेकिन इस चमक-दमक के बीच सदियों पुरानी मिट्टी के दीयों की परंपरा आधुनिकता की चकाचौंध में फीकी पड़ती नजर आ रही है। इलेक्ट्रॉनिक लाइटों के बढ़ते चलन के कारण मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों की चिंता बढ़ गई है।


दीपावली पर घरों को रोशन करने के लिए पहले मिट्टी के दीयों की सबसे अधिक मांग रहती थी। त्योहार से कई दिन पहले ही कुम्हार अपने चाक पर मिट्टी के दीये तैयार करने में जुट जाते थे। बाजारों में दीयों की खरीदारी के लिए ग्राहकों की भीड़ उमड़ती थी। लेकिन बदलते समय के साथ लोगों की पसंद भी बदल रही है। अब पारंपरिक मिट्टी के दीयों के स्थान पर इलेक्ट्रॉनिक झालरें और आकर्षक लाइटें तेजी से लोगों की पहली पसंद बनती जा रही हैं।




विकासनगर में मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार मनोज कुमार बताते हैं कि वह दिनभर चाक पर मेहनत करके मिट्टी के दीये तैयार करते हैं, लेकिन पहले की तुलना में अब इनकी बिक्री काफी कम हो गई है। उनका कहना है कि लोग घरों को सजाने के लिए मिट्टी के दीयों की बजाय इलेक्ट्रॉनिक झालरों और रंग-बिरंगी लाइटों को अधिक पसंद कर रहे हैं। इसके चलते पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े कुम्हारों के सामने अपनी आजीविका चलाने की चुनौती बढ़ती जा रही है।


कुम्हारों का कहना है कि मिट्टी के दीये तैयार करने में काफी मेहनत लगती है। पहले मिट्टी का इंतजाम करना पड़ता है, फिर उसे चाक पर आकार देकर दीये बनाए जाते हैं। इसके बाद दीयों को सुखाने और भट्ठी में पकाने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। इतनी मेहनत के बावजूद यदि बाजार में उचित बिक्री नहीं होती है तो लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। त्योहारों के दौरान होने वाली कमाई पर निर्भर रहने वाले कुम्हारों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है।



बाजारों में इलेक्ट्रॉनिक झालरों की बढ़ती मांग का एक बड़ा कारण उनकी आकर्षक बनावट और बार-बार इस्तेमाल करने की सुविधा भी है। अलग-अलग रंगों और डिजाइन में उपलब्ध ये लाइटें घरों, दुकानों और प्रतिष्ठानों की सजावट के लिए लोगों को पसंद आ रही हैं। इसके विपरीत मिट्टी के दीयों को जलाने के लिए तेल, बाती और देखभाल की आवश्यकता होती है। ऐसे में सुविधा और आधुनिक सजावट के चलते लोगों का रुझान इलेक्ट्रॉनिक लाइटिंग की ओर बढ़ रहा है।

हालांकि, आधुनिकता के इस दौर में भी मिट्टी के दीयों की परंपरा को महत्व देने वाले लोगों की कमी नहीं है। विकासनगर के बाजार में खरीदारी करने पहुंचे प्रदीप कुमार और श्यामा शर्मा जैसे ग्राहक आज भी मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता दे रहे हैं। उनका मानना है कि दीपावली केवल रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। मिट्टी के दीये जलाने से त्योहार की पारंपरिक सुंदरता और सांस्कृतिक पहचान बनी रहती है।



पारंपरिक दीयों की खरीदारी करने वाले लोगों का कहना है कि मिट्टी के दीये हमारी सभ्यता और लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। दीपावली पर घर के आंगन, मंदिर और दरवाजों पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। इन दीयों की रोशनी केवल अंधकार दूर करने का माध्यम नहीं, बल्कि शुभता, आस्था और समृद्धि का प्रतीक भी मानी जाती है। ऐसे में आधुनिक सजावट के साथ पारंपरिक दीयों का महत्व बनाए रखना भी आवश्यक है।


मिट्टी के दीयों की घटती मांग का असर केवल एक व्यवसाय पर नहीं, बल्कि पारंपरिक शिल्पकला और उससे जुड़े परिवारों की आजीविका पर भी पड़ रहा है। कुम्हारों की कई पीढ़ियां मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने के व्यवसाय से जुड़ी रही हैं। यदि स्थानीय स्तर पर इन उत्पादों की मांग लगातार कम होती रही तो आने वाले समय में इस पारंपरिक कला को जीवित रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना और कुम्हारों की मेहनत का उचित मूल्य देना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दीपावली की तैयारियों के बीच मिट्टी के दीयों की लौ आज भी हमारी लोक परंपरा, संस्कृति और आत्मनिर्भरता का संदेश दे रही है। स्थानीय कुम्हारों से मिट्टी के दीये खरीदकर लोग न केवल अपने घरों को पारंपरिक रोशनी से सजा सकते हैं, बल्कि इन दीयों को बनाने वाले परिवारों की आजीविका में भी सहयोग कर सकते हैं। अब देखना होगा कि इलेक्ट्रॉनिक झालरों की बढ़ती चमक के बीच दीपावली के अंतिम दिनों में मिट्टी के दीयों की बिक्री कितनी बढ़ती है और कुम्हारों के चेहरों पर खुशियों की रोशनी कितनी लौट पाती है।

