वसुंधरा ताल में देश का पहला स्वदेशी ग्लेशियर लेक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित

वसुंधरा ताल में देश का पहला स्वदेशी ग्लेशियर लेक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित

स्थान : देहरादून
ब्यूरो रिपोर्ट

उत्तराखंड ने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। प्रदेश के संवेदनशील वसुंधरा ताल में देश का पहला स्वदेशी ग्लेशियर लेक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित किया गया है। इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से ग्लेशियर झील के टूटने से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरे की समय रहते जानकारी मिल सकेगी। इससे आपदा के जोखिम को कम करने और समय पर एहतियाती कदम उठाने में मदद मिलेगी।

यह महत्वपूर्ण सिस्टम सीएसआईआर–सीबीआरआई के सहयोग से स्थापित किया गया है। उत्तराखंड इस तरह की स्वदेशी चेतावनी प्रणाली स्थापित करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों से उत्पन्न होने वाले खतरों को देखते हुए इस पहल को आपदा प्रबंधन की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन ने बताया कि यह सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। इसे कम लागत में तैयार किया गया है, ताकि सीमित संसाधनों के बावजूद संवेदनशील क्षेत्रों में प्रभावी निगरानी व्यवस्था विकसित की जा सके। इस तकनीक के माध्यम से प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले संभावित नुकसान को कम करने की दिशा में मदद मिलेगी।

उन्होंने बताया कि बाजार में इस तरह के सिस्टम को स्थापित करने की अनुमानित लागत करीब आठ से दस करोड़ रुपये आंकी जा रही थी। इसके विपरीत सीबीआरआई ने स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए इसे लगभग 61 लाख रुपये में तैयार कर स्थापित किया है। इससे न केवल लागत में बड़ी बचत हुई है, बल्कि देश में आपदा प्रबंधन के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित करने की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं।

सीबीआरआई के निदेशक प्रोफेसर प्रदीप कुमार के अनुसार, वसुंधरा ताल देश की 13 सबसे संवेदनशील ग्लेशियर झीलों में शामिल है। यहां संभावित खतरों की निगरानी के लिए विशेष तकनीकी व्यवस्था की गई है। झील की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए इस सिस्टम को स्थापित करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस अर्ली वॉर्निंग सिस्टम में आठ प्रकार के सेंसर लगाए गए हैं। ये सेंसर झील से संबंधित विभिन्न परिस्थितियों पर नजर रखने और संभावित खतरे के संकेतों का पता लगाने में मदद करेंगे। प्राप्त आंकड़ों के आधार पर खतरे की स्थिति का आकलन कर समय रहते चेतावनी जारी करने की व्यवस्था की गई है।

इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि खतरे की स्थिति में करीब दो घंटे पहले चेतावनी जारी करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे संबंधित विभागों और प्रशासन को आवश्यक कदम उठाने के लिए महत्वपूर्ण समय मिल सकेगा। समय रहते सूचना मिलने पर संभावित प्रभावित क्षेत्रों में सतर्कता बढ़ाने और जरूरी एहतियाती कार्रवाई करने में मदद मिल सकती है।

हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों के टूटने से अचानक बाढ़ जैसी गंभीर आपदाओं का खतरा बना रहता है। ऐसी घटनाओं में जान-माल और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हो सकता है। ऐसे में संवेदनशील झीलों की निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करना आपदा प्रबंधन की दृष्टि से बेहद जरूरी है। वसुंधरा ताल में स्थापित यह सिस्टम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

अधिकारियों के अनुसार, वसुंधरा ताल में लगाए गए सिस्टम का ट्रायल सफल रहने के बाद प्रदेश की अन्य संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर भी ऐसी प्रणालियां स्थापित की जाएंगी। इससे उत्तराखंड में आपदा पूर्व चेतावनी तंत्र को और मजबूत करने में मदद मिलेगी। कम लागत वाली स्वदेशी तकनीक के जरिए प्रदेश भविष्य में ग्लेशियर झीलों से जुड़े जोखिमों की निगरानी और प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।