दिल्ली में प्रदर्शनों को लेकर मुनि चिदानंद सरस्वती की दो टूक, कहा- अधिकारों के साथ कर्तव्य भी निभाएं

दिल्ली में प्रदर्शनों को लेकर मुनि चिदानंद सरस्वती की दो टूक, कहा- अधिकारों के साथ कर्तव्य भी निभाएं

स्थान : ऋषिकेश
ब्यूरो रिपोर्ट

देश की राजधानी दिल्ली में चल रहे विभिन्न आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों को लेकर परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के साथ नागरिकों को अपने मूल कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए।

स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि संविधान देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है और इसकी गरिमा बनाए रखना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि अधिकारों की बात करने वाले लोगों को यह भी समझना चाहिए कि उनके कार्यों से देश की शांति, सुरक्षा और एकता प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

दिल्ली में चल रहे प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यदि किसी गतिविधि से देश में अस्थिरता फैलने की आशंका हो, तो सभी को जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति या संगठन को विरोध के नाम पर देश को अस्थिरता की ओर धकेलने का अधिकार नहीं है।

स्वामी चिदानंद सरस्वती ने सवाल उठाया कि यदि संसद या अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर किसी प्रकार की अप्रिय घटना हो जाती है, तो इससे देश और दुनिया में क्या संदेश जाएगा। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध का तरीका ऐसा होना चाहिए, जिससे देश की संवैधानिक संस्थाओं और कानून व्यवस्था के प्रति सम्मान बना रहे।

उन्होंने कहा कि सड़कों पर उतरकर अराजकता फैलाना, बैरियर तोड़ना और पुलिसकर्मियों के साथ टकराव की स्थिति पैदा करना उचित नहीं है। उनके अनुसार, विरोध प्रदर्शन के दौरान कानून व्यवस्था को चुनौती देने के बजाय शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों से अपनी मांगों को सामने रखना चाहिए।

परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष ने कहा कि संविधान नागरिकों को अधिकार देने के साथ ही कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा भी देता है। उन्होंने कहा कि संविधान की रक्षा की बात करने वालों को स्वयं भी संविधान के दायरे में रहकर अपने विचार व्यक्त करने चाहिए।

स्वामी चिदानंद सरस्वती ने देश की शांति और एकता बनाए रखने पर जोर देते हुए कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि असहमति और विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, लेकिन उनका स्वरूप शांतिपूर्ण और जिम्मेदार होना चाहिए।

उन्होंने सभी नागरिकों और प्रदर्शनकारियों से संयम बरतने तथा कानून का सम्मान करने की अपील की। स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि देश की शांति, एकता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपनी मांगों को उठाने के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग किया जाना चाहिए, लेकिन इस दौरान सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक सद्भाव को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।