

स्थान : जसपुर (ऊधम सिंह नगर)
ब्यूरो रिपोर्ट


दीपों के महापर्व दीपावली में अब कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। एक ओर बाजार रंग-बिरंगी बिजली की झालरों और इलेक्ट्रॉनिक सजावटी सामान से जगमगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मिट्टी के दीये बनाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाले कुम्हारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा होता दिखाई दे रहा है। दीपावली की तैयारियों में पिछले तीन महीनों से दिन-रात मेहनत कर रहे मिट्टी के कारीगरों को इस बार भी अपने उत्पादों की अच्छी बिक्री की उम्मीद है, लेकिन बाजार में इलेक्ट्रॉनिक दीयों और झालरों के बढ़ते चलन ने उनकी चिंता बढ़ा दी है।


जसपुर शहर की आबादी से लगभग दो किलोमीटर दूर स्टेडियम के पास दक्ष प्रजापति चौक क्षेत्र में रहने वाले मिट्टी के कारीगर इन दिनों दीपावली की तैयारियों में जुटे हुए हैं। यहां कुम्हार परिवार अपने पारंपरिक चाक और हाथों की कला से मिट्टी के दीये, करवे, पुरवे, हठली और अन्य सजावटी सामग्री तैयार कर रहे हैं। इन्हीं कारीगरों की मेहनत से तैयार मिट्टी के दीये वर्षों से दीपावली के अवसर पर लोगों के घरों और आंगनों को रोशन करते आए हैं।





दीपावली का त्योहार मिट्टी के कारीगरों के लिए सालभर की कमाई का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। इस पर्व को लेकर कुम्हार परिवार कई महीने पहले से तैयारियां शुरू कर देते हैं। मिट्टी लाने से लेकर उसे तैयार करने, चाक पर दीयों को आकार देने, सुखाने और पकाने तक की पूरी प्रक्रिया में काफी मेहनत लगती है। इसके बावजूद बाजार में मिट्टी के दीयों की घटती मांग के कारण कारीगरों को अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिलना मुश्किल हो रहा है।


मिट्टी के कारीगर राजेंद्र सिंह ने बताया कि दीपावली के त्योहार के लिए वे करीब तीन महीने पहले से तैयारियां शुरू कर देते हैं। इस दौरान छोटे चिराग, बड़े चिराग, हठली, दीये, पुरवे और अन्य मिट्टी के सामान तैयार किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि दीपावली के अवसर पर इन उत्पादों की बिक्री से परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होने की उम्मीद रहती है। लेकिन बदलते समय के साथ बाजार में मिट्टी के दीयों की मांग प्रभावित हो रही है, जिससे कारीगरों की परेशानियां लगातार बढ़ रही हैं।



कारीगरों का कहना है कि पिछले कई वर्षों से बाजार में बिजली की झालरों, इलेक्ट्रॉनिक दीयों और चाइनीज सजावटी लाइटों की बिक्री बढ़ने से मिट्टी के पारंपरिक उत्पादों की मांग पर असर पड़ा है। लोग अपने घरों को सजाने के लिए बिजली से चलने वाली रंग-बिरंगी लाइटों को प्राथमिकता देने लगे हैं। इसका सीधा प्रभाव मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार परिवारों की आमदनी पर पड़ रहा है। कारीगरों के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक सजावट के बढ़ते चलन से उनके चाक की रफ्तार भी धीमी पड़ती जा रही है।
वहीं, मिट्टी के कारीगरों ने अपने पारंपरिक व्यवसाय के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी को भी बड़ी समस्या बताया है। उनका आरोप है कि सरकार और संबंधित विभागों की ओर से उन्हें पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। कारीगरों के मुताबिक मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली उपयुक्त मिट्टी मिलना भी मुश्किल होता जा रहा है। मिट्टी की उपलब्धता में परेशानी के कारण उत्पादन की लागत और मेहनत दोनों बढ़ जाती हैं।




कारीगरों का कहना है कि तीन महीने तक लगातार मेहनत करने के बाद जब वे अपने हाथों से तैयार किए गए उत्पादों को बाजार में बेचने के लिए ले जाते हैं तो उन्हें ग्राहकों का इंतजार करना पड़ता है। बाजार में आने वाले कई ग्राहक पारंपरिक मिट्टी के दीयों के बजाय इलेक्ट्रॉनिक दीयों और सजावटी झालरों की खरीदारी करना पसंद करते हैं। ऐसे में दिन-रात मेहनत कर तैयार किए गए उत्पादों की बिक्री उम्मीद के अनुरूप नहीं होने से कुम्हार परिवारों की आर्थिक परेशानियां बढ़ जाती हैं।

दीपावली का पर्व भारतीय संस्कृति में मिट्टी के दीयों के बिना अधूरा माना जाता है। सदियों से मिट्टी के दीये घरों, मंदिरों और आंगनों को रोशन करने के साथ भारतीय परंपरा और लोककला की पहचान रहे हैं। कुम्हारों की यह पारंपरिक कला न केवल सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, बल्कि अनेक परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन भी है। ऐसे में मिट्टी के दीयों की घटती बिक्री ने इस पुश्तैनी व्यवसाय के भविष्य को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।

फिलहाल जसपुर के दक्ष प्रजापति चौक क्षेत्र में रहने वाले मिट्टी के कारीगरों की निगाहें दीपावली के बाजार पर टिकी हुई हैं। उन्हें उम्मीद है कि लोग इस बार इलेक्ट्रॉनिक झालरों के साथ पारंपरिक मिट्टी के दीयों को भी महत्व देंगे और उनके हाथों से बने उत्पादों की खरीदारी करेंगे। कारीगरों ने सरकार से पारंपरिक व्यवसाय को बढ़ावा देने, उपयुक्त मिट्टी उपलब्ध कराने और आर्थिक सहायता जैसी सुविधाएं देने की मांग की है। अब देखना होगा कि दीपावली पर बाजारों की चकाचौंध के बीच इन मेहनतकश कुम्हारों के घरों में खुशियों के कितने दीये जल पाते हैं।

