भाजपा में सोशल मीडिया बयानबाजी पर अनुशासन की चर्चा, सौरभ बहुगुणा बोले—अपनी बात रखने की आजादी, लेकिन सीमा भी तय

भाजपा में सोशल मीडिया बयानबाजी पर अनुशासन की चर्चा, सौरभ बहुगुणा बोले—अपनी बात रखने की आजादी, लेकिन सीमा भी तय

स्थान : देहरादून
ब्यूरो रिपोर्ट

उत्तराखंड भाजपा में नेताओं और कार्यकर्ताओं की सोशल मीडिया पर सार्वजनिक बयानबाजी को लेकर अनुशासन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। चकराता से भाजपा के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रामशरण नौटियाल के पार्टी छोड़ने तथा उनकी नाराजगी के बाद यह विषय और प्रमुखता से सामने आया है।

रामशरण नौटियाल ने पार्टी छोड़ने के बाद सार्वजनिक मंचों पर अपमान और संगठन में अनुशासन से जुड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने संगठन की कार्यप्रणाली को लेकर भी नाराजगी जाहिर की थी। हालांकि भाजपा की ओर से शुरुआत में उनका इस्तीफा प्राप्त होने की पुष्टि नहीं की गई थी।

नौटियाल 2022 के विधानसभा चुनाव में चकराता सीट से भाजपा के प्रत्याशी रहे थे। इससे पहले वह देहरादून जिला पंचायत के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। लंबे समय से क्षेत्र में पार्टी के कुछ नेताओं के साथ उनके मतभेद और नाराजगी की खबरें सामने आती रही थीं।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा ने पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक व्यवस्था और अनुशासन दोनों को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि भाजपा एक लोकतांत्रिक पार्टी है और प्रत्येक कार्यकर्ता को अपनी बात रखने का अधिकार है।

बहुगुणा ने कहा कि पार्टी में कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने की पूरी स्वतंत्रता है, लेकिन संगठनात्मक अनुशासन की भी एक सीमा होती है। उन्होंने कहा कि किसी भी कार्यकर्ता या नेता को अपनी बात संगठन के उचित मंच पर रखनी चाहिए।

सौरभ बहुगुणा ने यह भी कहा कि भाजपा किसी “हिटलरशाही” तरीके से काम नहीं करती और पार्टी में विभिन्न मुद्दों पर संवाद की पर्याप्त गुंजाइश है। साथ ही उन्होंने संगठन के नियमों और मर्यादा का पालन करने की जरूरत पर जोर दिया।

रामशरण नौटियाल के मामले ने भाजपा के भीतर पुराने और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका तथा संगठन में संवाद के तरीके को लेकर भी राजनीतिक चर्चा तेज कर दी है। नौटियाल ने इस्तीफे के बाद कहा था कि वह फिलहाल अपने अगले राजनीतिक कदम पर विचार करेंगे।

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा संगठन अपनी अंदरूनी एकजुटता और अनुशासन पर विशेष ध्यान दे रहा है। ऐसे में नेताओं की सार्वजनिक बयानबाजी और सोशल मीडिया गतिविधियों को लेकर उठ रहे सवाल पार्टी की संगठनात्मक रणनीति का भी अहम हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं।