मसूरी शरदोत्सव में श्री घंटाकर्ण देव की जात्रा ने मोहा मन, देव संस्कृति की अनूठी झलक देख भावविभोर हुए श्रद्धालु

मसूरी शरदोत्सव में श्री घंटाकर्ण देव की जात्रा ने मोहा मन, देव संस्कृति की अनूठी झलक देख भावविभोर हुए श्रद्धालु

स्थान : मसूरी
ब्यूरो रिपोर्ट

पहाड़ की समृद्ध लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था और देवी-देवताओं की प्राचीन परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की अनूठी पहल मसूरी शरदोत्सव की चौथी शाम देखने को मिली। टाउन हॉल में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में केदारखंड के प्रसिद्ध आराध्य देवता श्री घंटाकर्ण देव की पारंपरिक जात्रा का भव्य मंचन किया गया। देवता के नौजा निशान और पारंपरिक पूजन की झलक देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

मसूरी शरदोत्सव के मंच पर पहली बार प्रस्तुत की गई श्री घंटाकर्ण देव की जात्रा ने दर्शकों को उत्तराखंड की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराया। कार्यक्रम के दौरान देव यात्रा के पारंपरिक स्वरूप, धार्मिक अनुष्ठानों और लोक संस्कृति की सुंदर प्रस्तुति ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। कई श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य देव को नमन कर आस्था प्रकट की।

फिल्म निर्देशक एवं लोक संस्कृति कर्मी प्रदीप भंडारी के निर्देशन में तैयार इस विशेष प्रस्तुति में श्री घंटाकर्ण देव की यात्रा को पारंपरिक स्वरूप में जीवंत करने का प्रयास किया गया। मंच पर कलाकारों ने देव यात्रा से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और सांस्कृतिक विशेषताओं को दर्शाया। इस प्रस्तुति का उद्देश्य दर्शकों को पहाड़ की प्राचीन देव संस्कृति के महत्व से परिचित कराना था।

आयोजकों के अनुसार श्री घंटाकर्ण देव को भगवान शिव का अंश माना जाता है और उन्हें बदरीनाथ क्षेत्र के क्षेत्रपाल के रूप में पूजा जाता है। उत्तराखंड की धार्मिक परंपराओं में श्री घंटाकर्ण देव का विशेष स्थान है। उनकी पूजा-अर्चना, नौजा निशान और देव यात्रा की परंपरा केदारखंड की विशिष्ट धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक नौजा निशान और देव यात्रा से जुड़े दृश्यों ने उपस्थित दर्शकों को भावुक कर दिया। श्रद्धालुओं ने मंच पर अपने आराध्य देव की परंपराओं को देखकर श्रद्धा व्यक्त की। इस आयोजन ने न केवल धार्मिक आस्था को प्रदर्शित किया, बल्कि उन सांस्कृतिक परंपराओं को भी सामने रखा, जो सदियों से पहाड़ के समाज और उसकी पहचान से जुड़ी हुई हैं।

फिल्म निर्देशक प्रदीप भंडारी ने कहा कि वर्तमान समय में नई पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा शहरों में जन्म ले रहा है और वहीं उसका पालन-पोषण हो रहा है। ऐसे में कई बच्चों और युवाओं को अपनी गौरवशाली लोक संस्कृति, परंपराओं और देवी-देवताओं के बारे में नजदीक से जानने का अवसर नहीं मिल पाता। इसी सोच के साथ श्री घंटाकर्ण देव की जात्रा को शरदोत्सव के मंच पर प्रस्तुत करने की पहल की गई।

प्रदीप भंडारी ने बताया कि इस सांस्कृतिक प्रस्तुति का मुख्य उद्देश्य युवाओं को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि जब युवा अपनी लोक संस्कृति और धार्मिक विरासत को करीब से देखेंगे और समझेंगे, तो उनके भीतर इसके बारे में जानने की जिज्ञासा विकसित होगी। इससे नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझने के साथ पहाड़ की ओर भी आकर्षित होगी।

उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन पुरानी पीढ़ी के लिए भी विशेष महत्व रखते हैं। अपने आराध्य देव की परंपराओं को मंच पर देखकर बुजुर्गों और स्थानीय लोगों को अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़ने का अवसर मिलता है। प्रदीप भंडारी ने बताया कि श्री घंटाकर्ण देव की विशाल देव यात्रा हर 12 वर्ष में आयोजित होने की परंपरा है। इस यात्रा में नौजा निशान और विशेष पूजन पद्धति का महत्वपूर्ण स्थान होता है, जो इसे अन्य देव यात्राओं से अलग पहचान देती है।

मसूरी शरदोत्सव की चौथी शाम श्री घंटाकर्ण देव की जात्रा के मंचन ने उत्तराखंड की देव संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का महत्वपूर्ण संदेश दिया। कार्यक्रम के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया गया। श्रद्धा, आस्था और लोक परंपराओं से सजी इस प्रस्तुति ने दर्शकों पर विशेष छाप छोड़ी। आयोजन ने यह संदेश दिया कि आधुनिकता के दौर में भी अपनी लोक संस्कृति और धार्मिक परंपराओं को जीवित रखना बेहद आवश्यक है।