उत्तराखंड में रिवर्स माइग्रेशन में 44 प्रतिशत वृद्धि, पलायन रोकने के लिए रोजगार और सुविधाओं पर जोर

उत्तराखंड में रिवर्स माइग्रेशन में 44 प्रतिशत वृद्धि, पलायन रोकने के लिए रोजगार और सुविधाओं पर जोर

स्थान : देहरादून
ब्यूरो रिपोर्ट

उत्तराखंड में लंबे समय से गंभीर चुनौती बने पलायन के बीच सरकार ने रिवर्स माइग्रेशन में 44 प्रतिशत वृद्धि दर्ज होने की बात कही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 27 सितंबर को नई दिल्ली में प्रवासी उत्तराखंडियों और विभिन्न क्षेत्रों के बुद्धिजीवियों के साथ संवाद के दौरान कहा कि पर्यटन, स्वरोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों के विस्तार से गांवों की ओर वापसी को बढ़ावा मिला है।

प्रदेश में पलायन की समस्या विशेष रूप से सीमांत और पर्वतीय जिलों में लंबे समय से बनी हुई है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोगों ने गांव छोड़कर शहरों और दूसरे राज्यों का रुख किया। पौड़ी और अल्मोड़ा जैसे जिलों में इस समस्या का प्रभाव अधिक देखने को मिला है।

मुख्यमंत्री ने दिल्ली में प्रवासी उत्तराखंडियों के साथ बैठक में राज्य के विकास में उनकी भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि सरकार का प्रयास है कि बाहर रह रहे उत्तराखंडी अपने अनुभव, निवेश और विशेषज्ञता के माध्यम से राज्य की अर्थव्यवस्था और स्थानीय रोजगार को मजबूत करने में योगदान दें।

सरकार के अनुसार होमस्टे, पर्यटन, स्वरोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी योजनाओं के माध्यम से पहाड़ी क्षेत्रों में आजीविका के नए अवसर तैयार किए जा रहे हैं। हाल में सरकार ने दीनदयाल उपाध्याय होमस्टे विकास योजना को भी रिवर्स पलायन से जोड़ते हुए इसके जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ने का दावा किया है।

पिछले महीने ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की बैठक में मुख्यमंत्री ने विभागों को रिवर्स माइग्रेशन से जुड़ी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों में स्वरोजगार, कृषि, पर्यटन और स्थानीय संसाधनों पर आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देने की जरूरत बताई थी।

हालांकि पलायन रोकने के लिए केवल रोजगार ही नहीं, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं की गुणवत्ता भी अहम मानी जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों में कई विद्यालयों में छात्र संख्या घटने, शिक्षकों की कमी और प्रयोगशाला जैसी सुविधाओं के अभाव की समस्या सामने आती रही है।

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी दूरस्थ इलाकों में डॉक्टरों, विशेषज्ञों और जरूरी संसाधनों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यदि गांवों में स्थायी आबादी बनाए रखनी है तो रोजगार के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, संचार और अन्य जनसेवाओं को भरोसेमंद बनाना जरूरी होगा।

पलायन निवारण की दिशा में सरकार की ओर से किए जा रहे प्रयासों के बावजूद चुनौती अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। रिवर्स माइग्रेशन में 44 प्रतिशत वृद्धि का आंकड़ा सरकार द्वारा पलायन निवारण आयोग के हवाले से प्रस्तुत किया गया है, लेकिन इसकी दीर्घकालीन सफलता का आकलन इस बात से होगा कि गांव लौटने वाले कितने लोग स्थायी रूप से वहीं आजीविका स्थापित कर पाते हैं।

उत्तराखंड के लिए आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती ऐसी एकीकृत नीति तैयार करने की होगी, जिसमें रोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और अवस्थापना विकास को एक साथ जोड़ा जाए। गांवों में स्थायी अवसर तैयार होने पर ही पलायन रोकने और रिवर्स माइग्रेशन को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने की दिशा में अपेक्षित परिणाम सामने आ सकेंगे।