AI से संरक्षित होंगी पहाड़ की लोकभाषाएं, सात लाख शब्द-वाक्यों का डेटा जुटाया

AI से संरक्षित होंगी पहाड़ की लोकभाषाएं, सात लाख शब्द-वाक्यों का डेटा जुटाया

स्थान : मसूरी
ब्यूरो रिपोर्ट

उत्तराखंड की लोकभाषाओं गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को डिजिटल युग में संरक्षित करने की पहल शुरू की गई है। भाषा एआई की कोर टीम ने मसूरी में संवाद कार्यक्रम के दौरान क्षेत्रीय भाषाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक से जोड़ने की अपनी योजना साझा की।

टीम के सदस्यों का कहना है कि बदलते समय में क्षेत्रीय भाषाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पर्याप्त स्थान नहीं मिला तो आने वाली पीढ़ियां इन भाषाओं के कई पारंपरिक शब्दों, उनके अर्थ और सही उच्चारण से दूर हो सकती हैं। इसी को देखते हुए भाषाई विरासत को डिजिटल स्वरूप में संरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है।

भाषा एआई-स्टडी इंजीनियरिंग फाउंडेशन के माध्यम से अब तक गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार क्षेत्र से करीब सात लाख शब्द, वाक्य और उनके अर्थ एकत्र किए जा चुके हैं। इस सामग्री को व्यवस्थित कर डिजिटल डेटाबेस तैयार करने की दिशा में काम किया जा रहा है।

टीम से जुड़े सच्चिदानंद सेमवाल, अनिल गोदियाल और राजेंद्र सिंह रावत ने बताया कि वर्तमान में बड़ी मात्रा में भाषाई सामग्री पुरानी किताबों, पांडुलिपियों और स्थानीय साहित्य में मौजूद है। इसे डिजिटल स्वरूप देने के साथ ही लोगों की बोलचाल, उच्चारण और आवाज की रिकॉर्डिंग भी एकत्र की जा रही है।

टीम ने लेखकों, शिक्षकों, भाषा प्रेमियों और आम लोगों से पुरानी किताबें, पांडुलिपियां, स्थानीय शब्दकोश तथा अर्थ सहित क्षेत्रीय शब्दावली उपलब्ध कराने की अपील की है। इसके अलावा गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी की ऑडियो रिकॉर्डिंग भी अभियान के लिए महत्वपूर्ण बताई गई हैं।

परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए देहरादून में संस्था का कार्यालय स्थापित किया गया है। भाषाई डेटा को तकनीकी रूप से तैयार करने में विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है। टीम के मुताबिक इस पहल को व्यापक स्वरूप देने के लिए सरकार के साथ एमओयू की दिशा में भी बातचीत चल रही है।

सच्चिदानंद सेमवाल ने बताया कि अभियान को केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रखा गया है। अमेरिका और कनाडा सहित विदेशों में रह रहे उत्तराखंड मूल के लोगों को भी इससे जोड़ा जा रहा है, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित शब्दों और उच्चारण को भी संरक्षित किया जा सके।

उन्होंने कहा कि यह प्रयास केवल एआई मॉडल विकसित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की मुहिम है। संस्था का लक्ष्य आने वाले एक-दो वर्षों में तैयार भाषाई डेटा को प्रमुख एआई और भाषा तकनीक प्लेटफॉर्म तक पहुंचाने का है।

सेमवाल ने कहा कि गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी जैसी लोकभाषाओं के संरक्षण के लिए सरकार के साथ समाज की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है। उन्होंने लेखकों, बुजुर्गों, शिक्षकों, भाषा प्रेमियों और आम लोगों से अपने पास मौजूद दुर्लभ भाषाई सामग्री साझा कर इस अभियान में सहयोग करने की अपील की।