राजकीय प्राथमिक विद्यालय बेडुला में धूमधाम से मनाया गया गढ़भोज दिवस, बच्चों और ग्रामीणों ने लिया पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद

राजकीय प्राथमिक विद्यालय बेडुला में धूमधाम से मनाया गया गढ़भोज दिवस, बच्चों और ग्रामीणों ने लिया पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद

स्थान : चमोली
ब्यूरो रिपोर्ट

विकासखंड नारायणबगड़ के राजकीय प्राथमिक विद्यालय बेडुला में गढ़भोज दिवस बड़े उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विद्यालय परिसर उत्तराखंड के पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों की खुशबू से महक उठा। कार्यक्रम में स्कूली बच्चों के साथ अभिभावकों और ग्रामीणों ने भी बढ़-चढ़कर प्रतिभाग किया। सभी ने मालू के पत्तों पर परोसे गए पारंपरिक पहाड़ी भोजन का आनंद लेते हुए उत्तराखंड की समृद्ध खान-पान संस्कृति को करीब से जाना।

गढ़भोज दिवस के अवसर पर विद्यालय में पहाड़ के विभिन्न पारंपरिक व्यंजन तैयार किए गए। इनमें भड्डू की दाल, काफली, फाणू, चौंसा, लाल चावल, कोदे की रोटी, कोदे की बाड़ी और झंगोरे की खीर सहित कई स्थानीय पकवान शामिल रहे। पारंपरिक तरीके से बनाए गए इन व्यंजनों का बच्चों और ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक स्वाद लिया।

कार्यक्रम की विशेष बात यह रही कि भोजन को पारंपरिक अंदाज में मालू के पत्तों पर परोसा गया। इससे बच्चों को न केवल पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद चखने का अवसर मिला, बल्कि उत्तराखंड की पुरानी खान-पान परंपराओं के बारे में भी जानकारी प्राप्त हुई। विद्यालय परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम से स्थानीय संस्कृति और परंपराओं की झलक देखने को मिली।

इस अवसर पर ग्राम प्रधान बेडुला उर्मिला देवी कंडारी ने कहा कि गढ़भोज दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड के पारंपरिक भोजन को बढ़ावा देना और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवनशैली के बीच पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों का महत्व बनाए रखना बेहद जरूरी है।

ग्राम प्रधान उर्मिला देवी कंडारी ने कहा कि उत्तराखंड के पारंपरिक भोजन में स्थानीय अनाज और पौष्टिक सामग्री का भरपूर उपयोग किया जाता है। मंडुवा, झंगोरा सहित अन्य पहाड़ी अनाज स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों को इन खाद्य पदार्थों के महत्व के बारे में जानकारी देना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी खान-पान परंपराओं को संरक्षित रख सकें।

विद्यालय की प्रधानाध्यापिका अनिता चंद्रवाल ने कहा कि गढ़भोज दिवस का आयोजन विद्यार्थियों को स्थानीय पारंपरिक भोजन के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से किया गया है। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों को विभिन्न पहाड़ी व्यंजनों और उनमें पाए जाने वाले पौष्टिक तत्वों की जानकारी दी गई। साथ ही उन्हें संतुलित और पौष्टिक भोजन के महत्व के बारे में भी जागरूक किया गया।

प्रधानाध्यापिका ने कहा कि स्थानीय अनाज और पारंपरिक खाद्य पदार्थ उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका उपयोग स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने के साथ स्थानीय कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी उपयोगी है। उन्होंने विद्यार्थियों से अपनी पारंपरिक खान-पान संस्कृति को अपनाने और इसके संरक्षण में योगदान देने का आह्वान किया।

गढ़भोज दिवस के दौरान स्कूली बच्चों में विशेष उत्साह देखने को मिला। बच्चों ने पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेने के साथ उनके नाम, बनाने की विधि और पोषण संबंधी विशेषताओं के बारे में जानकारी प्राप्त की। वहीं अभिभावकों और ग्रामीणों ने भी कार्यक्रम में सहभागिता कर स्थानीय भोजन की परंपरा को आगे बढ़ाने का संदेश दिया।

कार्यक्रम में विद्यालय प्रबंधन समिति की अध्यक्ष ऊषा नैनवाल, सुशीला देवी, मनोरमा देवी सहित विद्यालय के विद्यार्थी, अभिभावक और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। सभी ने गढ़भोज दिवस के आयोजन की सराहना करते हुए उत्तराखंड की पारंपरिक खान-पान संस्कृति को संरक्षित रखने पर जोर दिया। विद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम ने बच्चों को अपनी लोक संस्कृति से जोड़ने के साथ पौष्टिक भोजन के प्रति जागरूक करने का संदेश दिया।