
स्थान : उधम सिंह नगर
ब्यूरो रिपोर्ट

ऊधमसिंह नगर में फर्जी जाति और स्थायी निवास प्रमाणपत्रों के लगातार सामने आ रहे मामलों ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बाजपुर में कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणपत्र बनवाने के मामले में नौ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है और चार प्रमाणपत्र निरस्त किए गए हैं। वहीं गदरपुर में भी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणपत्र बनवाने के प्रयास में दो युवकों को पुलिस के हवाले किया गया।

इन मामलों में अब तक कार्रवाई का मुख्य केंद्र आवेदक और कथित बिचौलिये रहे हैं। इसी कारण यह सवाल भी उठ रहा है कि जिन फाइलों के आधार पर प्रमाणपत्र जारी हुए, उनकी जांच, सत्यापन और संस्तुति की प्रशासनिक प्रक्रिया में कहीं चूक हुई या नहीं। प्रमाणपत्र अंततः सरकारी ऑनलाइन प्रणाली के माध्यम से ही जारी होते हैं और जिले की तहसीलों में प्रमाणपत्र ई-डिस्ट्रिक्ट व्यवस्था के तहत ऑनलाइन जारी किए जाते हैं।



बाजपुर मामले में जांच के दौरान राशन कार्ड, परिवार रजिस्टर, बिजली बिल, शैक्षिक अभिलेख और मतदाता सूची समेत कई दस्तावेजों का संबंधित सरकारी रिकॉर्ड से मिलान नहीं होने की बात सामने आई है। इन्हीं विसंगतियों के बाद प्रमाणपत्र निरस्त किए गए और पुलिस कार्रवाई शुरू हुई।


मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि आवेदन के साथ लगाए गए दस्तावेज कूटरचित थे, तो वे जांच और सत्यापन की विभिन्न प्रक्रियाओं को पार कर प्रमाणपत्र जारी होने की स्थिति तक कैसे पहुंचे। यह प्रश्न संबंधित जांच प्रक्रिया, सत्यापन व्यवस्था और उसे पूरा करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की भी पड़ताल की मांग करता है। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में किसी राजस्व अधिकारी की मिलीभगत साबित होने की जानकारी सामने नहीं आई है।


बाजपुर में सामने आए मामलों को लेकर प्रशासन और पुलिस की जांच जारी है। रिपोर्टों के अनुसार मेडिकल कॉलेज में प्रवेश तथा अन्य लाभ हासिल करने के लिए फर्जी जाति और स्थायी निवास प्रमाणपत्र बनवाए जाने का आरोप है। पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार भी किया है।

वहीं गदरपुर में भी कूटरचित अभिलेखों के आधार पर जाति और निवास प्रमाणपत्र बनवाने के प्रयास का मामला सामने आया है। प्रशासन ने दो युवकों को पकड़कर पुलिस को सौंपा। बाजपुर और गदरपुर में लगभग एक ही समय पर सामने आए इन प्रकरणों ने प्रमाणपत्र जारी करने की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा की जरूरत को रेखांकित किया है।



अब बड़ा सवाल यह है कि जांच केवल प्रमाणपत्र हासिल करने वालों और बिचौलियों तक सीमित रहेगी या फाइलों की जांच और संस्तुति से जुड़े प्रत्येक चरण की भी जिम्मेदारी तय होगी। यदि कहीं विभागीय लापरवाही हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय होना जरूरी होगा, और यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की मिलीभगत के प्रमाण मिलते हैं तो उसके खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

हालांकि किसी पटवारी, राजस्व अधिकारी या प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारी को बिना जांच के इस फर्जीवाड़े में शामिल मान लेना उचित नहीं होगा। यह तय करना जांच एजेंसियों का काम है कि मामला केवल जाली दस्तावेज पेश करने तक सीमित था या सत्यापन प्रक्रिया में भी जानबूझकर अनदेखी या मिलीभगत हुई।
लगातार सामने आ रहे मामलों के बीच प्रशासन के सामने अब केवल फर्जी प्रमाणपत्र निरस्त करने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी जिम्मेदारी है कि भविष्य में कूटरचित दस्तावेज सत्यापन प्रणाली को पार न कर सकें। इसके लिए पुराने संदिग्ध प्रमाणपत्रों का ऑडिट, सत्यापन प्रक्रिया की समीक्षा और हर स्तर पर जवाबदेही तय करने की मांग मजबूत होती दिख रही है।

