
स्थान : ज्योतिर्मठ (चमोली)
ब्यूरो रिपोर्ट

उर्गम घाटी के भर्की गांव क्षेत्र में घने जंगलों के बीच स्थित भगवान फ्यूंलानारायण मंदिर के कपाट विशेष पूजा-अर्चना के बाद विधि-विधान से बंद कर दिए गए। दोपहर करीब 2:30 बजे धार्मिक परंपराओं के अनुसार कपाट बंद करने की प्रक्रिया पूरी की गई।

हिमालयी क्षेत्र में स्थित भगवान नारायण का यह पौराणिक मंदिर अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के कपाट वर्ष में करीब डेढ़ माह के लिए ही श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोले जाते हैं।



उर्गम घाटी के सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मण सिंह नेगी ने बताया कि कपाट बंद होने के दिन सुबह से ही मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो गए थे। इस दौरान भगवान फ्यूंलानारायण की परंपरागत रीति से पूजा-अर्चना की गई।

उन्होंने बताया कि सबसे पहले भगवान को बालभोग लगाया गया। इसके बाद राजभोग अर्पित किया गया और कपाट बंद करने से जुड़ी धार्मिक प्रक्रियाएं शुरू की गईं।


मंदिर में मौजूद पुजारियों और श्रद्धालुओं ने भगवान नारायण की विशेष पूजा की। वैदिक और स्थानीय परंपराओं के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होने के बाद भगवान से क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की गई।
विशेष पूजा-अर्चना के बाद दोपहर करीब ढाई बजे भगवान फ्यूंलानारायण मंदिर के कपाट विधि-विधान के साथ बंद कर दिए गए। इस दौरान क्षेत्र के ग्रामीण और श्रद्धालु भी मौजूद रहे।




फ्यूंलानारायण मंदिर की सबसे विशेष परंपराओं में भगवान के श्रृंगार की व्यवस्था शामिल है। यहां कपाट बंद होने की प्रक्रिया के दौरान कुंवारी कन्याओं द्वारा फूलों से भगवान नारायण का श्रृंगार किए जाने की परंपरा बताई जाती है।
मंदिर की एक अन्य विशिष्ट परंपरा यह है कि यहां पूजा-अर्चना का अधिकार ठाकुर जाति से जुड़े पुजारियों को प्राप्त है। पीढ़ियों से स्थानीय परंपराओं के अनुसार मंदिर में पूजा-पद्धति का निर्वहन किया जाता रहा है।
उर्गम घाटी की प्राकृतिक सुंदरता के बीच स्थित फ्यूंलानारायण मंदिर धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। सीमित अवधि के लिए कपाट खुलने के कारण इस मंदिर के दर्शन और यहां निभाई जाने वाली परंपराओं का श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व है।

